ANASARCA: symptoms, causes, consequences, treatment

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ANASARCA का परिचय

किसी भी अनुपयुक्त औषधि के दुरुपयोग से कभी-कभी ‘हृदय‘, ‘यकृत‘ या ‘वृक्क‘ आदि के विकारों के कारण शरीर के किसी एक भाग या सारे शरीर पर सूजन / ANASARCA treatment hindi हो जाती है।

ANASARCA के कारण

1. कार्टीजोन औषधियों का लगातार प्रयोग।

2. नमका अधिक उपयोग।

3. अनीमिया/खून की कमी से।

4. गर्भावस्था।

5. कभी-कभी हृदय, यकृत या वृक्क आदि के विकारों से।

6. सरसों के तेल में सत्यानाशी के बीजों के तेल (आरजीमोन) के मिश्रण के कारण ही सूजन होती है। मिलावट की मात्रा अधिक होने पर ही यह जानलेवा होता है।

ANASARCA के लक्षण

इस रोग में कभी-कभी सारा शरीर खमीर की तरह सूज जाता है। शोथ को यदि अँगुली से दबाया जाये तो गड्डा पड़ जाता है और अंगुली हटा लेने के थोड़ी देर बाद में गड्डा भर जाता है। शोथयुक्त स्थान की त्वचा का रंग फीका पड़ जाता है और वहाँ हाथ रखने से त्वचा ठंडी मालूम पड़ती है। कभी-कभी शोथ इतना अधिक बढ़ जाता है कि त्वचा फट जाती है। कछ रोगियों को दस्त की शिकायत हो जाती है और उनकी पाचन क्रिया बिगड़ जाती है। उन्हें बेचैनी और घबराहट रहती है। सूजन / ANASARCA treatment hindi के कारण चलना-फिरना कठिन हो जाता है। कुछ रोगियों को सांस लेने में कठिनाई होती है।

आरजीमोन का विष तत्व ‘सैक्वीनेरीन’ है। इसके सेवन से रक्तवाहिनियों की ‘परमिएबिलिरी’ बढ़ जाती है तथा अन्तःकोषीय जल की मात्रा बढ़ जाती है। इससे हृदय, फेफड़े, जिगर, गुर्दे व आँख के पर्दे पर सूजन / ANASARCA treatment hindi आ जाती है तथा हृदय की पेशियों में शिथिलता आ जाती है। इसमें मृत्यु का कारण हृदय का रुक जाना है। इसका कोई एण्टीडोट नहीं है। रोगी के लक्षणों के आधार पर विशेषज्ञों की देखरेख में उपचार किया जाता है।

मिलावट का परिणाम- जिन लोगों में सरसों के तेल में मिलावट के कारण लक्षण पैदा होते हैं। उनके कई अंगों में विकृति आ सकती है। विशेष रूप से प्रभावित अंग यकृत (लिवर), गुर्दे एवं आँखें होती हैं।

सम्बन्धित विशेष लक्षण

* हाथ-पैर में अकारण दर्द ।

* भूख न लगना।

* पैरों में सूजन / ANASARCA treatment hindi, जो चलने पर बढ़ जाती है।

* उल्टी, दस्त होने लगते हैं।

* साँस फूलने लगती है।

* आँखों में दर्द रहता है।

* सारे शरीर पर सूजन / ANASARCA treatment hindi हो जाती है, पानी भर जाता है।

चिकित्सा विधि

1. शोथ निवारक उपचार करें।

2. उच्चशक्ति वाले मूत्रवर्धक (High potency diuretic) औषधियों यथा सिस्टोन, सोडा बाई कार्ब आदि का व्यवहार करें।

3. आधुनिक औषधियों में फ्रूसेमाइड (Frusemide) 40-80 मिग्रा० तक प्रतिदिन मुख से दें अथवा शिरामार्ग द्वारा 20-40 मिग्रा० तक दें।

4. यदि ड्राप्सी का कारण सरसों का तेल में मिलावट आरजीमोन के कारण है तो रोगी को तुरन्त साधन सम्पन्न अस्पताल में भर्ती करा दें। रोगी के लक्षणों के आधार पर विशेषज्ञों की देखरेख में उपचार किया जाता है।

5. हृदय की कार्य अक्षमता में डिजिटेलिस का प्रयोग किया जाता है एवं वृक्क की अक्षमता में कॉर्टिकोस्टेराइड का प्रयोग किया जाता है।

पथ्यापथ्य एवं आनुषांगिक उपचार

1. इस रोग में भरपूर प्रोटीन आहार लेने का परामर्श दें। आहार में कच्चे पदार्थों का सेवन किन्तु लवण तथा जल का । सेवन बन्द कर दें।

2. ऐसे प्रबलकारी द्रव्यों का प्रयोग करें, जो लवण और जल का निष्कासन कर सकें।

3. पथ्य रूप में-गेहूँ का फुलका, गाय का दूध, सेब, सन्तरा, मौसमी, अकोय, अंगूर, किशमिश, पुनर्नवा के ताजे पत्तों का शाक, पालक, बथुआ, परवल के पत्तों का शाक, मकोय के पत्तों का शाक,शलजम, करेला, गेहूँ का दलिया, अंजीर पका पपीता, कच्चे पपीते की सब्जी आदि पथ्य हैं।

4. औटा कर ठंडा किया हुआ जल दिन भर में 10-12 गिलास पिलावें ताकि खब खुलकर मूत्र आये। पालक की भुजिया. बथुये की भुंजिया, मूली के पत्तों की भुजिया या इसके शाक दिन में 1-2 बार दें। क्योंकि यह सभी शाक सब्जियाँ शोफ निवारक हैं।

अपथ्य- नमक बिलकुल न दें। नमक से बनी चीजें (नमकीन, दालमोंठ, बीकानेरी भुजिया) न दें। कच्चा पानी, खट्टे, भारी बादी, घी, तेल वाले गरिष्ठ भोजन न दें। बैंगन, घी, मिर्च, मसाला, मैदा, माँस. तेल, खटाई, मिठाई, फास्ट फूड आदि का सेवन न करें।

सर्वांगशोथ में सेवन कराने योग्य आयु० पेटेन्ट टेबलेट्स

1. ओरुक्लिन (Oruclyn) ‘चरक’

2-2 गोली दिन में 3 बार जल के साथ बालक 1 गोली दिन में 2 या 3 बार।

2. आरोग्य मिश्रण टिक्की ‘धन्वन्तरि’

2-2 गोली दिन में 3 बार जल से।

3. लीरोन-88 (Leron-88) यूनाइटेड

1-2 गोली दिन में 2 बार भोजन के बाद जल से यह गोली हानि रहित, हर तरह से सुरक्षित एवं लम्बे समय तक प्रयोग की जा सकती है।

4. सुबाइगो (Subaigo) ऐमिल’

1-2 गोली दिन में 3 बार प्रातः दोपहर एवं शाम।

सर्वांगशोथ में सेवन कराने योग्य आयु० पेटेन्ट सीरप/तरल एवं ड्राप्स

1. लीवॉट्रीट टिकड़ी एवं प्रवाही ‘झण्डू’

प्रवाही 1-1 छोटा चम्मच दिन में 2 या 3 बार पानी के साथ सेवन करावें। साथ में इसी की 2-2 गोली सुबह-शाम पानी के साथ दें।

2. स्टोनैक्स (Stonex) ‘भारतीय’

वयस्क-2-4 चम्मच दिन में 3-4 बार । बालक 1-2 चम्मच दिन में 3-4 बार।

3. नीरी (Neeri) एमिल’

वयस्क-2-3 चम्मच दिन में 3 बार । बालक-1-2 चम्मच दिन में 3 बार।

* इसकी टेबलेट भी आती है।

4. जे० पी० लिव (J.P.Liv) ‘जमना’

1/2-2 चम्मच तक दिन में 3-4 बार।

सर्वांगशोथ की मिश्रित अनुभूत आयु० पेटेन्ट चिकित्सा

1. ‘चरक’ फार्मास्युटिकल्स की ‘ओरुक्लिन’ 2 गोली, हिमालया की लिव-52 1 टिकिया ।नीरी (एमिल) 1 टिकिया। ऐसी एक मात्रा दिन में 3 बार सेवन कराने से सर्वांगशोथ में आशातीत लाभ होता है।

2. चरक’ फार्मास्युटिकल्स की ‘लिवोमिन’ 1 टिकिया, लीरोन (यूनाइटेड) 1 टिकिया ऐसी 1-1 मात्रा दिन में 3 बार सेवन करायें।

*इस योग को नियमित रूप से 3-4 हफ्ते सेवन कराते रहने से सभी प्रकार के सर्वांगशोथ में लाभकारी है।

आधुनिक उपचार

आहार में नमक की मात्रा कम होनी चाहिये । भोजन में ऊपर से कोई नमक न देने पर 24 घण्टों में नमक की मात्रा 1 से 2 ग्राम होती है। फिर भी भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिये थोड़ा-सा नमक ऊपर से दिया जाना चाहिये।

रक्त में यूरिया का स्तर बढ़ा हुआ न होने पर आहार में प्रोटीन की मात्रा अधिक (24 घण्टों में 100 ग्राम तक) होनी चाहिये। कोई भी थियाजाइड ग्रुप की दंवा अथवा फ्रसेमाइड (Frusemide) दिया जा सकता है। साधारणतया इनमें से किसी एक की एक गोली दिन में 2 बार शुरू में दी जाती है-बाद में एक साधारण मात्रा (Maintenance dose) में इसे अनिश्चितकाल तक दिया जाता है। सम्भावित पोटेशियम अल्पता से बचाने के लिये साथ-साथ पोटेशियम क्लोराइड 3 4 ग्राम प्रतिदिन कैप्सूल के रूप में देना आवश्यक होता है। यदि इन दवाओं से शोफ में कमी नहीं आती तो ‘द्वितीयक ऐल्ड्रोस्टेरोनिज्म’ के बारे में विचार करना चाहिये और इसका उपचार ‘स्पाइरोनोलेक्टोन (Spironolactone)50 से 100 मिग्रा० प्रतिदिन देकर करना चाहिये।

जलोदर या जलवक्ष होने पर यदि मूत्रल दवाओं के प्रयोग से यह कम न हो अथवा साँस लेने में कठिनाई हो रही हो तो यांत्रिक विधियों से पानी निकाल देने की आवश्यकता होती है।

पूर्ण शैय्या विश्राम देना आवश्यक होता है। प्रेडनीसोलोन (60 mg प्रतिदिन शुरू में तथा बाद में धीरे-धीरे कम मात्रा में) का प्रयोग किया जा सकता है। संक्रमण से बचाव के लिये एम्पीसिलीन का प्रयोग बेहतर रहता है। साथ में ‘Liver corrective’ तथा हार्ट के लिये ‘डिजोक्सिन’ (Lanoxin) देना भी आवश्यक हो सकता है। ‘कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर’ की ओर ध्यान देकर चिकित्सा की जानी चाहिये।