Diarrhea: दस्त के लक्षण, कारण, परिणाम, चिकित्सा

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रोग परिचय/Diarrhea introduction

इस रोग में मुख्यतः पतले दस्त/Diarrhea treatment hindi होते हैं। पाखाना बँधकर नहीं आता है। रोगी को एक से अधिक बार या बार बार मलत्याग के लिये जाना पड़ता है। पेट में खलबलाहट या गुड़गुड़ाहट की आवाज के साथ दस्त/Diarrhea treatment hindi होते हैं। दस्त/Diarrhea treatment hindi में पानी अधिक और मल कम होता है। कभी-कभी उसमें गठीला मल गिरता है या उसमें अपक्व आहार द्रव्य होते हैं। इन सारे लक्षणों के अलावा अतिसार का एक विशिष्ट लक्षण यह है कि अपान वायु निकलने के समय उसके साथ मल भी बाहर आ जाता है।

दस्त के प्रमुख कारण/causes of diarrhea

1. अपच (अजीर्ण) इस रोग का प्रमुख कारण है।

2. आँतों की आकुंचन-प्रसरण क्रिया (पेरिस्टाल्सिस मूवमेंट) बढ़ जाती है तब उसका सही पाचन नहीं हो पाता है।

3. आँतों में सूजन आने से वे अपना काम ठीक से नहीं कर पातीं। इस कारण से भी दस्त/Diarrhea treatment hindi होते हैं।

4. कोई अखाद्य पदार्थ खा लेने, आहार के साथ कोई मक्खी या जीवजन्तु निगल लेने, आहार के साथ कोई जहरीला तत्व पेट में पहुँच जाने पर भी दस्त/Diarrhea treatment hindi शुरू हो जाते हैं। गर्मी के दिनों में लू लग जाने से भी दस्त/Diarrhea treatment hindi होने की सम्भावना रहती है।

5. सेवन की जाने वाली औषधि के अनुकूल न पड़ने से भी दस्त/Diarrhea treatment hindi प्रारम्भ हो जाते हैं।

6.. ऋतु परिवर्तन, दूषित वायु और दूषित जल से भी दस्त/Diarrhea treatment hindi होने लगते हैं।

7. टाइफाइड, आँतों की टी० बी० तथा हैजा जैसे रोगों में रोग के सूचक लक्षण के रूप में भी दस्त/Diarrhea treatment hindi हो जाया करते हैं।

8. कभी-कभी पहाड़ी प्रदेशों में प्रवास के दौरान ‘हिल डायरिया’/Diarrhea treatment hindi भी होते देखा गया है।

दस्त के प्रमुख लक्षण/symptoms of diarrhea

1. इसमें रोगी को बार-बार पतले दस्त होते हैं। पाखाना बँधकर नहीं आता है।

2. रोगी को एक से अधिक बार या बार बार मलत्याग के लिये जाना पड़ता है।

3. पेट में खलबलाहट या गुड़गुड़ाहट की आवाज के साथ दस्त होते हैं। दस्त में पानी अधिक और मल कम होता है।। कभी-कभी उसमें गठीला मल गिरता है। या उसमें अपक्व आहार द्रव्य होते हैं।

4. अपान वायु निकलने के समय उसके साथ मल भी बाहर आ जाता है।

5. अतिसार में बार-बार पाखाना जाने से किसी प्रकार का आहार न ले पाने से. शरीर का पानी (जलीयांश) मल के रास्ते बाहर निकल जाने (कम हो जाने) आदि कारणों से शरीर में अत्यधिक अशक्ति आ जाती है, पैरों में दर्द होता है, सिर चकराता है, लेटे रहने को जी चाहता है।

6. यदि जलीयांश अधिक मात्रा में दस्तों द्वारा बह जाता है तो जीभ सूख जाती है, त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, आँखें भीतर को धंस जाती हैं, हाथ-पैरों में गुठलियाँ पड़ जाती हैं और रोगी बेहोश भी हो जाता है। इस स्थिति को ‘शरीर में जलीय तत्व की कमी हो जाना’ (डिहाइड्रेशन) कहा जाता है।

निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) के कारण अशान्ति, बेचैनी, हाथ-पैरों में टूटन, बार-बार उल्टी और दस्त होना, हाथ-पैर ढीले पड़ जाना तथा रोगी खड़ा नहीं हो पाता है, उसे पसीना बहुत आता है, उसकी त्वचा ढीली पड़ जाती है, उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती है, नाड़ी तेज हो जाती है उसका ब्लड-प्रेशर कम हो जाता है, उसे पेशाब कम आता है और उसकी आँखें अन्दर को धंसने लगती हैं।

डायरिया की चिकित्सा विधि एवं पथ्य तथा सहायक चिकित्सा/Treatment method of diarrhea

चिकित्सा विधि

1. यदि दस्त शुरू हो जायें तो उन्हें एकदम नहीं रोकना चाहिये। मूलतः दस्त अपच के कारण हुआ करते हैं। उनसे पाचनतंत्र और शरीर की शुद्धि हो जाती है।

2. दस्त होने पर उसे रोकने वाली औषधियाँ लेने के बजाय पाचन को दुरुस्त करने वाली औषधियाँ लेनी चाहिये। ताकि अविशिष्ट आहार पच जाये और दस्त बँधकर आने लगे। पर इसका मतलब यह भी नहीं है कि दस्त को रोका ही न जाये अत्यधिक दस्त की स्थिति में इसके पहले ही इसका उपाय करना चाहिये।

पथ्य तथा सहायक चिकित्सा

1. नये अतिसार में अरारोट या साबूदाना दें। अनार या सन्तरे का रस दें।

2. अतिसार में दूध न दें।

3. पुराने अतिसार में चावलों का भात, मसूर की दाल के रस के साथ दें या मसूर की दाल का रस या साबूदाना दें अथवा कोई हल्का आहार दें।

सहायक चिकित्सा में- गर्म जल से कपड़ा भिगोकर अच्छी तरह निचोड़कर शरीर को पोंछवा दें। पेट हमेशा गर्म कपड़े से ढकवा कर रखें। सुबह-शाम टहलने का निर्देश दें।

नोट- सड़ांस वाले अतिसार में आलू, शकरकन्दी आदि कार्बोहाइड्रेट वाली चीजें खाने कोन दें। रोगी को शोक, भय, चिन्ता आदि मानसिक विकारों से बचायें।

चिकित्सा विधि के सम्बन्ध में कुछ अन्य विचार एवं निर्देशन/Some other thoughts and directions regarding medical practice

1. दस्त लगने पर खाना बन्द कर देना चाहिये । पाचन तंत्र पर किसी भी प्रकार का तरिक्त बोझ पड़े ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहिये। अतः जब तक दस्त बन्द न हो बारों और सही भूख न लगे, आहार लेना बन्द कर देना चाहिये।

2. यदि रोगी को प्यास लगे, कमजोरी प्रतीत हो, कुछ खाने को उसका जी चाहे तो पानी में शहद मिलाकर देने से उसे पोषण मिलेगा। किंचित नमक मिला हुआ पानी देने से वह रोगी को डिहाइड्रेशन से बचायेगा। नीबू और ग्लूकोज वाला पानी भी दिया जा सकता है।

3. यदि भूख लगे या कुछ खाना ही हो तो छौंके हुए मुरमुरे या लाई खाये जा सकते हैं। दूध में आधा पानी डालकर अदरक सोंठ एवं कम शक्कर का काढ़ा दिया जा सकता है। एकाध पतली सिकी हुई रोटी दे सकते हैं।

4. दस्त बन्द हो जाने के बाद भी थोड़े दिनों तक तो केवल हल्का आहार ही लेना चाहिये, ताकि फिर से दस्त होने की सम्भावना न रहे। रोगी को भूख या प्यास लगने पर छाछ (मट्ठा) देनी चाहिये। छाछ में शुद्ध सेंधा नमक, पिसा धनिया जीरा मिलाकर लेना अच्छा होता है। दस्त के रोगी को 3 से 5 ग्राम सोंठ का चूर्ण छाछ या पानी के साथ दिन में दो से तीन बार लेने से दस्त फौरन बन्द हो जाते हैं।

शरीर में जल की कमी जानलेवा हो सकती है। अतएव रोगी को डब्ल्यू० एस० ओ. ओ० आर० एस० (O.R.S.) जीवन रक्षक घोल दें। अगर जीवन रक्षक औषधि (O.R.SH पैकेट न हो तो एक ग्लास ताजा पानी में 2 चम्मच चीनी या ग्लूकोज और 2 चुटकी भर नमक मिलाकर रोगी को दें।

घर में बनाये इस घोल के अलावा रोगी को मीठी शिकंजी, नारियल का पानी चावल का मॉड, जौ का पानी (वार्ली वाटर), दाल का पानी, मट्ठा (छाछ) या फलों का रस भी है। सकते हैं। आमतौर पर मामूली रोग तो इन घरेलू पेय पदार्थों के प्रयोग से ठीक हो जाया करते हैं।

जल की कमी में ‘चावल’ सर्वोत्तम है क्योंकि चावल पचने के बाद रोगी को ग्लूकोज और अमीनो एसिड की पूर्ति में सहायता देता है।

चावल का जीवन रक्षक घोल/Life-saving solution of rice for diarrhea

आप चावल का जीवन रक्षक घोल (O. R. S.) भी बना सकते हैं।

पके चावल या चावल का पका पाउडर 30 ग्राम, नमक 1/2 छोटा चम्मच, पौटेशियम (नारियल का पानी या सन्तरे, मौसमी का जूस या वेजीटेबल सूप) 100 से 200 मिली लीटर और उबला पानी 1000 मिली लीटर लें।
बनाने की विधि- इन सबको घोलकर दो साफ बोतलों में भरकर रख लें और रोगी को । आवश्यकता के अनुसार थोड़ा थोड़ा करके पिलायें।

याद रखिये- यह घोल रोगी के मूत्र त्याग के अनुसार दें। जब तक रोगी को खुलकर पेशाब न आ जाये, तब तक इस घोल को देना अच्छा रहता है।

नोट- उपरोक्त जीवन रक्षक घोल डिहाइड्रेशन (जलीयांश की कमी में) की स्थिति में प्राण रक्षा का कार्य करते हैं। साथ ही डायरिया/Diarrhea की प्रारम्भिक स्थिति में देते रहने से जलीयांश की कमी नहीं होने पाती है।

इस हेतु फेयरडील कारपोरेशन का इलेक्ट्रॉल या इलेक्ट्रॉल फोर्ट (Electrol forte) पाउडर भी बाजारों में मिलता है जो लिफाफे के पैकिंग में मिलता है। इसे उबाले हुए जल को ठण्डा कर मिलाकर हर 1/2-1/2 घण्टे पर रोगी को पीने के लिये दिया जाता है।

डारिया में प्रयुक्त आयुर्वेदिक पेटेन्ट टेबलेट्स/Ayurvedic Patent Tablets Used in diarrhea

1. एम्बीमेप (Ambimap) ‘महार्षि’

1-2 गोली दिन में 3 बार।

2. एम्जोली (Amzoli) ‘Akshay’

तीव्र रोग में 2-2 गोली दिन में 3 बार। क्रानिक केस में 2 टिकिया दिन में 2 बार।

3. कोलोपेक्स (Colopax) रैलीज’

1-1 टिकिया दिन में 2-3 बार । कम से कम 5 दिन तक।

4. डायारेक्स (Diarex) ‘हिमालया’

वयस्क 1-2 टिकिया दिन में 2 बार। बालक-1/2 टिकिया दिन में 2 बार।

5. डायरिन (Diarrhin) अजमेरा’

1-3 गोली दिन में 2 बार। इसका तरल आता है। मात्रा 1-2 चम्मच दिन में 2 बार ।

6. डिसेन्ट्रिन (Dysentrin) ‘AAP’

1-2 गोली दिन में 4 बार।

7. डिसेण्ट्रोल (Dysentrol) ‘धन्वन्तरि’

1-2 टिकिया दिन में 3 बार। यह औषधि। अमीबियासिस में भी विशेष लाभकारी है।।

8. जी० एस० टेबलेट (G.S. Tab.) ‘प्रभात’

1-2 टिकिया दिन में 2 बार।

9. कोस्त-संजीवनी (Kosht-Sanjivini) ‘Pavaman’

1-2 टिकिया दिन में 2 बार ।।

10. कुटज कम्पाउण्ड (KutajaCompound)

2-2 टिकिया दिन में 3 बार। मुनियल’ (Muniyal)

11. डायसूर (Diasure) ‘पियल’

2-2 टिकिया दिन में 3 बार।

12. एमेबिका टेबलेट (Amoebica Tab.) ‘वैद्यनाथ

1-2 टिकिया दिन में 3-4 बार।

13.दीपन टेबलेट (Deepan Tab.) ‘हिमालय’

2-2 टिकिया दिन में 2-3 बार अथवा आवश्यकतानुसार दें।

14. डाइरोल टेबलेट (Diarol Tab.) ‘गर्ग’

2-2 टिकिया प्रति 4 घण्टे पर जल से।

15. ओजस टेबलेट (Ojus Tab.) ‘चरक’

वयस्कों को 1-2 टिकिया भोजन से पूर्व पानी से सेवन करायें।

16. इंटरोडिन (Enterodin)

1-2 टिकिया दिन में 3 बार । बच्चों को 1/2 भारतीय औषधि निर्माणशाला’ से 1 टिकिया अवस्थानुसार दें।

17. ग्रहणी कपाट वटी वैद्यनाथ’

2-2 टिकिया दिन में 3-4 बार।

18. इंट्रोकाम टेबलेट अनुजा’

वयस्कों को 2-2 टिकिया दिन में 3 बार।। बच्चों को 1-1 टिकिया दिन में 3 बार।

19. स्टोमोल (Stomol) “हर्बोमेड’

2-2 टिकिया दिन में 2-3 बार अथवा आवश्यकतानुसार दें।

20. डायारिन (Diarrhin) ‘ग्लोब’

1-2 टिकिया दिन में 3 बार अथवा आवश्यकतानुसार दें।

21. लीवरबूम (Liverboom) मार्तण्ड’

2-2 टिकिया दिन में 3 बार अथवा आवश्यकतानुसार बच्चों को 1-1 टिकिया दिन में 3 बार दें। नन्हें बच्चों को 1/2-1 टिकिया दूध में पीसकर या शहद के साथ दें।

22. एडीसिन टेब० (Adicin Tab.) ‘हर्बोमेड’

2-2 टिकिया दिन में 3 बार अथवा आवश्यकतानुसार बच्चों को 1/2-1 टिकिया। दिन में 2-3 बार खाना खाने के उपरान्त दें।

23. एमेडियो टेब० एमिल’

1-1 टिकिया दिन में 2-3 बार अथवा आवश्यकतानुसार दें।

24. डायरिन टेब० ‘अजमेरा’

1-2 टिकिया दिन में 2-3 बार अथवा आवश्यकतानुसार दें।

25. लशुनोल (Lashunol) ‘मार्तण्ड’

2-2 टिकिया दिन में 3 बार अथवा आवश्यकतानुसार सेवन करायें।

26. बर्वीरोल टेबलेट ‘हर्बल’

1-2 टिकिया दिन में 3-4 बार अथवा आवश्यकतानुसार सेवन करायें।

27. डायडिस टेब०

वयस्कों को 2-4 टिकिया दिन में 3-4 बार। भारतीय महौषधि संस्थान बच्चों को 1-2 टिकिया दिन में 3-4 बार। शिशुओं को 1/2 टिकिया दिन में 3-4 बार सेवन करायें।

28. एन्टी-डिसेन्ट्रोल ऊझा’

आवश्यकतानुसार प्रयोग करें।

29. टे० डेस्ट्रोल फोर्ट ‘नि० कमल फार्मेसी’

2 टिकिया दिन में 3 बार गर्म जल से।।

अतिसार/डायरिया की आयुर्वेदिक पेटेन्ट कैप्सूल चिकित्सा

1. अतिसरान्तक के० (Atisarantak Cap.)

2-3 कैप्सूल रोजाना। बालक-1-2 कै। ‘ज्वाला’ रोजाना।

2. कुडा (Kuda) ‘Pragathi

1-2 कै० दिन में 3 बार।

3. लोमक्योर (Lomcure) ‘Doctor’

वयस्क-2-2 के० दिन में 3 बार । बालक 1-1 कै० दिन में 3 बार।

नोट- यह औषधि डिसेण्ट्री, अमीबिक डिसेण्ट्री, ग्रीष्म अतिसार (Summer diarrhoea), Fermentative dyspepsia, गैस्ट्रो-इण्टेराइटिस एवं कोलाइटिस में समान रूप से लाभकारी है।

4. मायो कैप (Mayo Cap) ‘कुमार’

1-1 कैप्सूल दिन में 3 बार। यह औषधि डायरिया/Diarrhea, अमीबियासिस, I. B.S. में विशेष उपयोगी है।

5. माइटिल (Mitil) ‘लाउरेल’ (Laurel)

1-1 कैप्सूल दिन में 2 बार । डायरिया/Diarrhea और डिसेण्ट्री में उपयुक्त है।

6. डाइऐक्स (Dyex) रेडीक्यूरा’

2-2 कै० दिन में 3 बार। यह औषधि अमीबियासिस, डिसेण्ट्री में भी लाभकारी है।

7. मोबिक कैप (Mobic Cap) ‘ट्रायो’

2-2 कै० दिन में 3 बार 7 से 10 दिन तक दें।

नोट- यह औषधि Amoebiasis, Dysentery, Abdominal pain and associated flatulence, Diantrin, Trichomona giardia, Amoebic colitis, Nonspecific diarrhoea समान रूप से उपयोगी है।

8. नोडीज कैप्सूल और सीरप (Nodys Cap. & Syrup) नि० ‘सवाई’ (Sawai)

1-2 कै० दिन में 2-3 बार। इसका सीरप भी आता है। मात्रा 2-2 चम्मच दिन में 3 बार। बालक-1/2 चम्मच दिन में 3 बार।

9.. डायोनिल कै० ‘इण्डो-जर्मन’

1-2 कैप्सूल दिन में 2-3 बार अथवा आवश्यकतानुसार भोजनोपरान्त जल से या मट्ठे के साथ प्रयोग करें।

10. एण्टेरोसूल कै० पंकज’

1-1 कै० दिन में 3-4 बार दें। तीव्र रोग में 2-2 कै० दिन में 3-4 बार शीतल जल से दें।

11. प्रीसन कै० ‘सन इण्डिया’

2-2 कै० दिन में 3 बार दें। 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों को 1-1 कै० दिन में 2 बार दें।

12. विमलिब कै० (VimlibCap.) ‘धूतपापेश्वर’

1-1 कै० सुबह-शाम दिन में 2 बार या आवश्यकतानुसार दें।

13. डायरोसिन-500 कै० सिन्थोकेम’

1-2 कै० दिन में 3-4 बार अथवा आवश्यकतानुसार जल से सेवन करायें।

14. डायोसिड कै० ‘योवा’

1-2 कै० दिन में 2-3 बार अथवा आवश्यकतानसार दें। बच्चों को आयु के अनुसार विभाजित मात्रा में शहद के साथ दें।

अतिसार/डायरिया की आयुर्वेदिक पेटेन्ट पेय/सीरप चिकित्सा

1. सीरप डायडिन (Syp. Diadyn) ‘चरक फार्मास्युटिकल्स’

2-2 चम्मच दिन में 3 बार।

2. कोलीकार्मिन सीरप (Colicarmin Syp.) नि० “बान’

वयस्क-2-2 चम्मच दिन में 2-3 बार बालक-1 चम्मच दिन में 3 बार।

3. डायामॉक्स लिक्विड (Dymax Liquid)

1-2 चम्मच दिन में 3-4 बार दें। मानब्रो

4. अर्क कर्पूर (Ark Karpoor) ‘राजवैद्य’

2-4 बूंद जल या बताशे में।

5. क्लोरोडीन (Chlorodine) राजवैद्य’

10-15 बूंद जल के साथ दिन में 2-3 बार दें।

6. अमृतधारा (Amrat Dhara)’अमृत धारा फार्मेसी’

10-15 बूंद पानी में दिन में कई बार |

7. पुदीन हरा (Pudine Hara) ‘डाबर’

वयस्क-12 से 36 बूंद शीतल जल से। बालक-3 से 12 बूंद शीतल जल से और। शिशु-2 बूंद शहद के साथ।

8. धारा (Dhara) वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन’

5-10 बूंद शीतल जल के साथ आवश्यकतानुसार दें।

9. बर्बराल सीरप (Berberol Syp.) ‘हर्बल लेबो०’

1-3 चम्मच दिन में 3 बार ।

नोट- इसकी टेबलेट भी आती है।

10. डायारिल सीरप

शिशुओं को 5-10 बूंद दिन में 3 बार। बच्चों ‘आर्य औषधि फार्मास्युटिकल्स’ को 1-2 चम्मच दिन में 3 बार | सहायक औषधि-कम्पनी की ही डिसेन्ट्रीन गोली। नोट-बच्चों के आमातिसार एवं प्रवाहिका में विशेष उपयोगी।

11. सनडैस्टो सीरप (Sundesto Syp.)

वयस्क-1-2 चम्मच। बालक-20-30 बूंद ‘संजीवन रिसर्च शीतल जल के साथ दें।

12. अतिसारेक्स (Atisarex) यमुना फार्मेसी’

2-3 चम्मच दिन में 3 बार । बच्चों को 1/2-1 चम्मच दिन में 3 बार 1 सप्ताह तक दें।।

13. एन्ट्रोक्स (Antrox) ‘यूनेक्सो’

1-2 चम्मच दिन में 3 बार।

14. डायरिन सीरप (Diarrhin Syp.) ‘अजमेरा फार्मास्युटिकल्स’

1-2 चम्मच दिन में 3 बार ।

15. बैक्टीफर सीरप (Bactifer Syp.)

वयस्क-1-2 चम्मच दिन में 3 बार । बालकआयुलेब्स’ 1/2-1 चम्मच दिन में 3 बार।

डायरिया की इन्जेक्शन चिकित्सा

कुछ आयुर्वेदिक संस्थानों ने आयुर्वेदिक पेटेन्ट इन्जेक्शन बनाये हैं जो अतिसार/डायरिया में लाभकर पाये गये हैं। यथा-

1. अतिसारहन (ए० बी० एम० रिसर्च कं०)- 2 मिली० कूल्हे में।

2. अतिसारिन (जी० ए० मिश्रा फार्मेसी)- 1-2 मिली० की सुई कूल्हे में।

3. अहिफेन सुरासार (बी० एम० रिसर्च)- 10-20 बूंद तक माँस में।

4. इन्जे० जलोदरारि (जी० ए० मिश्रा फार्मेसी)- 1-2 मिली० प्रति तीसरे दिन माँस में।

5. इन्जे० डायासीन (जे० एण्ड जे० डीशेन कं०)- 1 मिली० माँस में आवश्यकतानुसार।

6. इन्जे० नॉर्मल सैलाइन (सिद्धि आयु० फार्मेसी)- 1-4 पॉइन्ट तक नस में।

अतिसार की मिश्रित औषधियों द्वारा अनुभूत चिकित्सा

1. अजीर्ण, कै,मितली, खट्टी डकार, उदर शूल, अफारा, पेट में गैस, वायुगोला आदि विकारों के साथ अतिसार में- कर्पूर 1 भाग, स्प्रिट रेक्टीफाइड 8 भाग, चंदन तेल 2 भाग, तेजाब गंधक | भाग, तेल इलाइची 2 भाग, तेल अजवाइन 2 भाग, सफेद प्याज का रस 20 भाग, नौसादर 4 भाग, पिपरमिन्ट 1 भाग-सबको मिलाकर 2 दिन धूप में रखें, गलकर दवा तैयार हो जायेगी। मात्रा-10-20 बूंद आवश्यकतानुसार।

2. किसी भी प्रकार की आँव वाली पेचिस या मरोड़ वाले अतिसार में- बर्बीरोल 1 टिकिया, तुलसी के बीज (भुने हुए) 2 ग्राम, बेल का गूदा भुना हुआ 2 ग्राम लें। सबको पीसकर एक पुड़िया बना लें। ऐसी 1-1 पुड़िया दिन में तीन बार ताजे जल से लें।

3. किसी भी प्रकार के अतिसार में सेवन कराने योग्य अनुभूत योग- एमेडियो (एमिल कं०) 1 टिकिया, ग्रहणी कपाट वटी (वैद्यनाथ) 1 टिकिया, दीपन टेब० (हिमालया कं०) 1 टिकिया-ऐसी 1 मात्रा दिन में 3 बार दें।

4. बच्चों के संक्रामक दस्त, हरे-पीले या बदबू वाले दस्त होना या बच्चों के किसी भी प्रकार के संक्रामक पेचिस में- बर्बल सीरप (हर्बल) 1 चम्मच, सीरप डायडिन (चरक फार्मास्यु०) 1 चम्मच-दोनों को मिलाकर ऐसी एक मात्रा दिन में 3 बार दें।

5. अजीर्ण. अपच. अरुचि आदि उदर विकारों के साथ अतिसार होना- लीवरबन 1 टिकिया (मार्तण्ड कं०), एडीसिन (हर्बोमेड) 1 टिकिया, जाइम (झण्डू) 1 टिकिया-ऐसी एक-एक मात्रा दिन में 2 बार दें।

डायरिया की आधुनिक उपचार

डायरिया/Diarrhea में डीहाइड्रेशन को ठीक करना ही इस रोग की मुख्य चिकित्सा है। कम और सामान्य पानी की कमी में रोगी को जीवन रक्षक घोल देने से ही वह ठीक हो सकता है। परन्तु अति तीव्र डिहाइड्रेशन (जल की कमी) में शुरू से ही I/V ड्रिप द्वारा लवण, ग्लूकोज व सैलाइन देना चाहिये।

एक साल से छोटे बच्चों को रीगरलैक्टेट I/V द्वारा 30/40 मिली०/किलो पहले 3 | घण्टों में देते हैं और उसके बाद मँह द्वारा 0.R.S. 40 मिली०/किलो दिया जाता है। अगर घर में 0.R.S. का पैकिट न हो तो एक गिलास पानी में 2 चम्मच चीनी या ग्लूकोज और 2 चुटकी भर नमक मिलाकर रोगी को दें। घर में बनाये घोल के अलावा रोगी को शिकंजी, नारियल पानी, चावल का माँड़, जौ का पानी, दाल का पानी, मट्ठा आदि भी दे सकते हैं।

अधिकतर रोगी ओरल रीहाइड्रेशन चिकित्सा से ठीक हो जाते हैं परन्तु अति तीव्र अतिसार में औषधियों की जरूरत पड़ती है। इसके लिये क्योलिन (Kaolin) पाउडर या घाल के रूप में दिया जा सकता है (8 ग्राम प्रत्येक 4 घण्टे बाद)। पेक्टिन (Pectin भी लाभदायक है। बाजार में क्योलिन तथा पेक्टिन के मिले-जुले घोल (जैसे-काल्टिन आदि) उपलब्ध हैं बिस्मथ कार्ब.24 घण्टे में 2 बार दिया जा सकता है। कोडीन (30 मियाया टिचर ओपियम (Tincture opium) 5 से 10 min. प्रत्येक 6 घण्टों पर, आवश्यकता पड़ने पर (यदि डायरिया/Diarrhea न रुक पाये तो) दिया जा सकता है। ऐसे रोगियों में लोपरामाइड हाइड्रोक्लोराइड, 2 मिग्रा० 4 या 6 घण्टे बाद दिया जा सकता है। साथ में हो रहे उल्टी या मरोड़ को रोकने के लिये उल्टी या मरोड़ रोधक दवाओं का प्रयोग किया जाना चाहिये।

* कॉलरा की स्थिति में कै० टेट्रासाइक्लीन (टैरामाइसीन) 250 मिग्रा० हर 6 घण्टे में देते रहें।

*’अमीबियासिस’ और ‘जियारडिएसिस’ की स्थिति में डायरिया/Diarrhea के लिये टेब० मैट्रोनिडाजोल 200-400 मिग्रा० दिन में 3 बार दें।

* ‘शिंगैला’ की स्थिति में कै० टेट्रासाइक्लीन 250 मिग्रा० हर 6 घण्टे में अथवा टेब० – कोट्राई-मोक्साजोल (Oriprim D.S.) 1 गोली सुबह-शाम 5 से 7 दिनों तक दें।

डायरिया की विशिष्ट चिकित्सा

यह डायरिया/Diarrhea के कारणों पर निर्भर करता है। सामान्य मल परीक्षण, मल का कल्चर अथवा अन्य जाँच विधियों द्वारा डायरिया/Diarrhea का सही कारण का पता लगाया जाना चाहिये और उसी के अनुकूल विशिष्ट दवा का व्यवहार किया जाना चाहिये। एक साथ बहत सारी दवाओं का प्रयोग उचित नहीं होता।